दशम भाव में षष्ठेश का क्या अर्थ है?
षष्ठ भाव का स्वामी रोज़ के काम, सेवा, प्रतिस्पर्धा, ऋण और स्वास्थ्य की आदतों का कारक है, और यह तीन कठिन भावों में से एक है। उसकी स्थिति दिखाती है कि प्रयास, प्रतिद्वंद्विता और समस्याओं का समाधान कहाँ इकट्ठा होते हैं। दशम भाव करियर, पद और सार्वजनिक कर्म का भाव है, चार केंद्रों (kendra, स्तंभ भाव) में सबसे बलवान, और वह भाव जिसे परंपरा काम और प्रतिष्ठा के लिए सबसे पहले पढ़ती है। दशम भाव में षष्ठेश होने से दोनों भाव जुड़ जाते हैं: षष्ठ भाव के विषय (काम, स्वास्थ्य की आदतें और प्रतिद्वंद्वी) दशम भाव (करियर और प्रतिष्ठा) में आ जाते हैं।
करियर के लिए दशम भाव में षष्ठेश को कैसे पढ़ा जाता है?
करियर के लिए सेवा और प्रतिस्पर्धा काम को आकार देती हैं: क़ानून, चिकित्सा सेवा, सशस्त्र बल, प्रतिस्पर्धी क्षेत्र और सेवा की भूमिकाएँ। शास्त्र वास्तविक कौशल के साथ धन और पिता के सहयोग में कम सहजता पढ़ते हैं, और विरोध को बार-बार आने वाला मानते हैं, जिसके लिए धैर्य और स्थिरता चाहिए। शास्त्र इसे मिश्रित मानते हैं: षष्ठ भाव के विषय (काम, स्वास्थ्य की आदतें और प्रतिद्वंद्वी) करियर में सार्वजनिक अभिव्यक्ति पाते हैं, जबकि उनमें से कुछ धैर्य माँगते हैं। बलवान स्वामी को इस स्थिति का सबसे अच्छा फल पाने वाला माना जाता है; निर्बल, अस्त या नीच स्वामी को इसका कम फल देने वाला।
लग्न दशम भाव में षष्ठेश को कैसे बदलता है?
षष्ठेश कौन-सा ग्रह है, यह लग्न पर निर्भर है, और दशम भाव में बैठने पर वह किस राशि में होगा, यह भी। भाव लग्न से पूर्ण राशि भाव पद्धति (whole-sign) से गिने जाते हैं (प्लेसिडस या भाव चलित जैसी भाव-संधि पर आधारित पद्धति राशि की सीमा के पास बैठे ग्रह को अगले भाव में ले जा सकती है)। गरिमा के हिसाब से यह स्थिति इन लग्नों के लिए सबसे बलवान है: तुला लग्न (गुरु कर्क राशि में)। सबसे निर्बल यह इन लग्नों के लिए है: धनु लग्न (शुक्र कन्या राशि में नीच), कुंभ लग्न (चंद्र वृश्चिक राशि में नीच), यदि नीच भंग न हो। भूमिका वाला स्तंभ पाराशरी पद्धति में उस लग्न के लिए ग्रह की समग्र भूमिका बताता है।
| लग्न | षष्ठेश | किस राशि में | गरिमा | भूमिका |
|---|---|---|---|---|
| मेष | बुध | मकर | सम राशि | कठिन |
| वृषभ | शुक्र | कुंभ | मित्र राशि | कठिन |
| मिथुन | मंगल | मीन | मित्र राशि | कठिन |
| कर्क | गुरु | मेष | मित्र राशि | सहायक |
| सिंह | शनि | वृषभ | मित्र राशि | कठिन |
| कन्या | शनि | मिथुन | मित्र राशि | मिश्रित |
| तुला | गुरु | कर्क | उच्च (सबसे बलवान) | कठिन |
| वृश्चिक | मंगल | सिंह | मित्र राशि | तटस्थ |
| धनु | शुक्र | कन्या | नीच (सबसे निर्बल) | कठिन |
| मकर | बुध | तुला | मित्र राशि | सहायक |
| कुंभ | चंद्र | वृश्चिक | नीच (सबसे निर्बल) | कठिन |
| मीन | सूर्य | धनु | मित्र राशि | कठिन |
दशम भाव में षष्ठेश को क्या बलवान या निर्बल बनाता है?
यह स्थिति हर कुंडली में एक ही नाम रखती है, पर परंपरा इसके फल आपके षष्ठ भाव के स्वामी ग्रह के बल से पढ़ती है। गरिमा सबसे पहले: स्वराशि या उच्च राशि में बैठा ग्रह अपने फल अधिक पूरे देता है, और नीच राशि में बैठा ग्रह कम। साथ और दृष्टि इसके बाद: गुरु की दृष्टि को रक्षक माना जाता है, और साथ बैठे कठोर ग्रह को घर्षण बढ़ाने वाला। सूर्य से निकटता (अस्त होना) ग्रह को निर्बल करती है। और दशम भाव को स्वयं समग्र रूप से पढ़ा जाता है, जिसमें उसमें बैठे हर ग्रह और उसके अपने स्वामी की स्थिति को साथ तौला जाता है।
D10 से दशम भाव में षष्ठेश की पुष्टि कैसे होती है?
पाराशरी पद्धति जन्म कुंडली की किसी स्थिति को उसके विषय की वर्ग कुंडली में जाँचती है: दशम भाव के लिए यह दशमांश (D10) है, जो करियर और सार्वजनिक प्रतिष्ठा के लिए देखा जाता है। यदि आपके षष्ठ भाव का स्वामी ग्रह वहाँ अपनी स्वराशि या उच्च राशि में है, तो परंपरा इस स्थिति को पुष्ट मानती है; यदि वह अपनी नीच राशि में है, तो रुका हुआ। वर्ग कुंडली राशिचक्र के हर 3 अंश पर राशि बदलती है, इसलिए यह जन्म समय के प्रति संवेदनशील है, और मिनट तक सही समय से यह जाँच भरोसेमंद होती है। कुंडली विवेचन आपकी कुंडली के लिए यह जाँच करता है।
दशम भाव में षष्ठेश कब सक्रिय होता है?
परंपरा किसी स्थिति को जीवन भर की मानती है, पर उसमें शामिल ग्रह की दशाओं में सबसे अधिक सक्रिय। विंशोत्तरी दशा पद्धति में आपके षष्ठ भाव के स्वामी ग्रह की महादशा और अंतर्दशाएँ (antardasha) वह समय हैं जब इस स्थिति के विषय सबसे अधिक दिखाई देते माने जाते हैं, साथ में उन ग्रहों की दशाएँ भी जिनकी इस पर दृष्टि है या जो इसके साथ बैठे हैं। दशा कैलकुलेटर आपके जन्म के लिए ये दशाएँ दिखाता है, और कुंडली की समयरेखा चल रही दशा का विवेचन करती है।
दशम भाव में षष्ठेश के साथ और किन बातों को देखा जाता है?
परंपरा किसी भाव को एक स्थिति से कभी नहीं पढ़ती। दशम भाव के स्वाभाविक कारक भी हैं, सूर्य, बुध, गुरु और शनि, जो पद, कौशल, परामर्श और परिश्रम के स्वाभाविक कारक हैं, और भाव तब सुदृढ़ माना जाता है जब उसका स्वामी और उसके कारक दोनों बलवान हों। दशम भाव पर गुरु की दृष्टि को रक्षक माना जाता है, उसमें कोई भी ग्रह बैठा हो। इस शृंखला के दूसरे पृष्ठ दशम भाव में हर ग्रह और हर भाव-स्वामी पर हैं, और कुंडली विवेचन आपकी कुंडली के लिए इन सबको साथ तौलता है।
KP दशम भाव में षष्ठेश को कैसे पढ़ता है?
कृष्णमूर्ति पद्धति (KP) जन्म के क्षण से भावों को असमान रूप में बाँटती है और दशम भाव को उसके आरंभ-बिंदु के उप-स्वामी (sub-lord) से परखती है। करियर के लिए KP द्वितीय, षष्ठ, दशम और एकादश भाव से संबंध को सहायक मानता है, और पंचम, नवम और द्वादश से संबंध को विरोधी। KP में षष्ठेश का महत्व इन्हीं संबंधों से है: यदि वह दशम भाव का कार्येश (significator) है, तो उसकी दशाओं को इस भाव के विषयों को आगे लाने वाला माना जाता है। कुंडली पृष्ठ पर KP विवेचन आपकी कुंडली के लिए यह दिखाता है।
यह गणना कैसे होती है
लाहिरी (चित्रापक्ष) अयनांश के साथ निरयन राशियाँ और पूर्ण राशि भाव, कला-विकला की सटीकता तक। सूर्योदय और सूर्यास्त वही हैं जो पंचांग दिखाते हैं, यानी अपवर्तन सहित सूर्य का ऊपरी किनारा, ताकि दिन के मुहूर्त-काल उन कैलेंडरों से मेल खाएँ जिनसे आप इन्हें मिलाते हैं। हमारी विधि के बारे में और जानें।
